🤝 सेवा – निःस्वार्थ देने की साधना
प्रकृति का नियम है — आदान-प्रदान। हम जितना लेते हैं, उतना लौटाना भी चाहिए।
नदियाँ, वृक्ष, बादल — सब बिना स्वार्थ दिए जाते हैं, तभी जीवन चलता है।
सेवा के तीन रूप
धन का दान – अपनी आय का एक अंश जरूरतमंदों और सत्कार्य में लगाना।
भोजन का दान – जो खाएं, उसका एक हिस्सा निःस्वार्थ किसी को खिलाना।
समय का दान – प्रतिदिन कम से कम एक घंटा सेवा में लगाना, चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या बौद्धिक।
सेवा से स्वार्थ घटता है, चिंता मिटती है और मन में स्थायी आनंद आता है।
सुमिरन – ध्यान और आत्मानुभूति
सुमिरन का अर्थ केवल जप या मंत्र नहीं —
बल्कि अंतर्मुख होकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप से जुड़ना
ध्यान का सरल अभ्यास
दिन में 3–4 बार, 10–20 मिनट के लिए आँख बंद कर शांति से बैठें।
कुछ न करें, कुछ न सोचें — केवल जो हो रहा है उसे होने दें।
धीरे-धीरे मन का भटकाव कम होगा और स्थिरता आएगी।
सुमिरन से अहंकार का आवरण हटता है,
बुद्धि में ज्ञान का प्रकाश आता है,
और जीवन में एक गहरी संतुष्टि अनुभव होती है।
समर्पण – अंतिम चरण
तप से शरीर शुद्ध होता है,
सेवा से मन निर्मल होता है,
सुमिरन से बुद्धि प्रकाशित होती है,
और अंत में समर्पण से आत्मा मुक्त होती है।
समर्पण का अर्थ है — अपने को भगवान की इच्छा के अनुसार साधन मात्र मानना, और हर परिस्थिति को स्वीकार करना।
यही वह अवस्था है जहाँ साधक आवागमन से मुक्त होकर भगवान के धाम में प्रवेश करता है।
प्रेरणा और आभार
यह साधना परंपरा पूज्य संतों और महान साधकों के मार्गदर्शन से विकसित हुई है।
हम उनके चरणों में कृतज्ञता अर्पित करते हैं और सभी साधकों को आमंत्रित करते हैं कि इस पथ पर चलकर अपने जीवन को स्वास्थ्य, शक्ति, आनंद, ज्ञान और प्रेम से भर दें।
