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भोजन क्यों? ध्यान साधना क्यों?
शरीर–मन–आत्मा के विज्ञान को सरल भाषा में समझने की एक गहरी यात्रा

मनुष्य का जीवन तीन स्तंभों पर टिका है—भोजन, विश्राम और ध्यान।
लेकिन सदियों से हम एक बड़ी भूल करते आ रहे हैं:
हम भोजन के महत्व को बढ़ा-चढ़ाकर देखते हैं और ध्यान के महत्व को लगभग भूल ही जाते हैं।
जबकि सत्य यह है कि —
भोजन शरीर को संभालता है,
और ध्यान शरीर को बदल देता है।
आज हम भोजन और ध्यान के वास्तविक विज्ञान को सरल, सहज और अनुभवजन्य शैली में समझेंगे—
ताकि आपको स्पष्ट दिखे कि
क्या वास्तविक शक्ति भोजन से आती है या ध्यान से?
और
क्यों शरीर की सफाई, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति भोजन से नहीं, बल्कि ध्यान और विश्राम से होती है?
चलिये शुरू करते हैं…
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भाग 1 : भोजन क्यों आवश्यक है?
हम अक्सर कहते हैं —
“भोजन से शक्ति मिलती है।”
लेकिन क्या यह सच है? या आधा सच?
1. भोजन जीवन के लिए अनिवार्य है — लेकिन शक्ति देने के लिए नहीं।
यहाँ एक गहरी बात समझना आवश्यक है—
भोजन का काम शक्ति देना नहीं, बल्कि
क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत करना,
पेशियों का निर्माण करना,
और शरीर की संरचना बनाए रखना है।
भोजन ईंधन जैसा है —
पर कार की असली ताकत इंजन की क्षमता से आती है,
न कि टंकी में पड़े ईंधन से।
ठीक उसी तरह,
भोजन शक्ति देता नहीं, शक्ति बनने की प्रक्रिया को सामग्री देता है।
2. भोजन खाते ही शक्ति क्यों लगती है?
क्या भोजन पेट में जाते ही ऊर्जा बन जाती है?
नहीं।
पाचन तो स्वयं घंटों का काम है।
फिर भी भोजन खाते ही शक्ति महसूस क्यों होती है?
कारण बेहद रोचक है —
➤ भोजन मल के उभार को रोक देता है।
हमारे शरीर में एक निरंतर प्रक्रिया चलती रहती है —
मल का उभार (toxic pressure build-up)।
जैसे ही यह उभार बढ़ता है, हमें कमजोरी लगती है।
ध्यान दें —
यह कमजोरी भोजन की कमी से नहीं होती,
यह अंदर जमा कचरे के कारण होती है।
जब आप भोजन खाते हैं,
उसी क्षण शरीर सफाई का काम रोक देता है
और मल का उभार थम जाता है।
इससे एक भ्रम पैदा होता है कि —
“भोजन ने शक्ति दे दी।”
जबकि वास्तविकता यह है—
भोजन ने केवल मल का उभार थामा है,
शक्ति नहीं दी।
कुछ घंटों बाद जैसे ही पाचन आगे बढ़ता है
और भोजन का दबाव खत्म होता है—
फिर से मल का उभार शुरू होता है।
और आपको फिर कमजोरी लगती है।
यही कारण है कि भोजन के 3–4 घंटे बाद फिर भूख लगती है।
यह वास्तविक भूख नहीं,
बल्कि toxic pressure की वापसी है।
3. भोजन का उद्देश्य क्या है?
भोजन का असली उद्देश्य—
- कोषों की मरम्मत
- पुट्ठों का निर्माण
- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि आदि धातुओं को पोषित करना
- शरीर की संरचना बनाए रखना
पर शक्ति देना इसका काम नहीं है।
शक्ति का असली स्रोत कुछ और है,
जो हम आगे समझेंगे।
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भाग 2 : क्या भोजन शक्ति देता है? एक वैज्ञानिक विश्लेषण
यद्यपि हम मान भी लें कि भोजन शक्ति देता है,
तो एक सीधा सवाल उठता है—
❓ क्या भोजन पेट में पहुँचते ही शक्ति दे देता है?
नहीं।
पाचन में 3 से 7 घंटे लग जाते हैं।
तो भोजन के तुरंत बाद शक्ति की अनुभूति क्यों?
क्योंकि भोजन आने से
शरीर सफाई बंद कर देता है,
और रुकावट खत्म होने से हल्का-हल्का आराम मिलता है।
यह शक्ति नहीं —
राहत है।
**❓ यदि भोजन से शक्ति मिलती है,
तो 3–4 घंटे बाद शरीर फिर शिथिल क्यों पड़ जाता है?**
क्योंकि भोजन द्वारा रोका गया
मल का दबाव फिर शुरू हो जाता है।
इससे स्पष्ट होता है —
भोजन शक्ति नहीं देता।
भोजन केवल सफाई को रोक देता है।
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भाग 3 : ऋषि-परंपरा का विज्ञान — “आहारं पचति शिखि दोषान्”
आयुर्वेद हजारों वर्ष पहले इस सत्य को समझ चुका था —
आहारं पचति शिखि दोषान्
आहार वर्जितः
अर्थ:
जठराग्नि भोजन को पचाती है,
और भोजन के अभाव में शरीर के दोषों (टॉक्सिन्स) को नष्ट करती है।
यानी —
- यदि पेट में भोजन है तो शरीर उसे पचाने में लग जाता है
- यदि पेट खाली है तो शरीर सफाई में लग जाता है
भोजन आते ही सफाई रुक जाती है।
और यह रुकावट वर्षों तक बढ़ती है
तो वही मल रोग बनकर शरीर में फैल जाता है।
इसलिए जो बार-बार खाता है
या भूख न लगने पर भी खाता है —
वह शरीर को सफाई का अवसर ही नहीं देता।
परिणाम —
- कब्ज
- गैस
- आलस्य
- थकान
- त्वचा रोग
- मोटापा
- रक्तदोष
- मधुमेह
- सूजन
- जोड़ों का दर्द
यही आधुनिक जीवन का रोग-जाल है।
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भाग 4 : शक्ति कहाँ से आती है? भोजन से या ध्यान से?
अब हम उस प्रश्न पर आते हैं
जिसका उत्तर हजारों साधकों ने अनुभव से पाया है —
असली शक्ति कहाँ से आती है?
उत्तर:
गहरी नींद और ध्यान से।
1. पहलवान कुश्ती खाली पेट क्यों लड़ता है?
क्योंकि भोजन भार देता है, शक्ति नहीं।
लड़ने के बाद काया टूटती है,
कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त होती हैं।
तभी वह भोजन करता है —
ताकि शरीर को सामग्री मिले मरम्मत की
और वह गहरी नींद ले सके।
2. ध्यान साधक भोजन से दस गुना शक्ति क्यों प्राप्त करता है?
क्योंकि ध्यान में —
- शरीर पूर्ण रिलैक्स
- तनाव शून्य
- साँस गहरी
- तंत्रिका तंत्र शांत
- कोशिकाएँ सक्रिय
- प्राण प्रवाह तीव्र
परिणाम —
कोशिकाएँ सिद्धि-शक्ति की तरह मरम्मत करने लगती हैं।
तीन घंटे का गहरा ध्यान
शरीर को उतनी शक्ति दे देता है
जितना भोजन कई दिनों में नहीं दे सकता।
ध्यान वह अवस्था है
जहाँ शरीर से ज्यादा शक्तिशाली आत्मा काम करने लगती है।
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भाग 5 : आत्मा — सबसे बड़ा डॉक्टर
यही वह बिन्दु है
जहाँ भोजन का विज्ञान समाप्त होता है
और आध्यात्मिक विज्ञान आरंभ।
ध्यान की अवस्था में क्या होता है?
जब साधक गहरे ध्यान में जाता है —
वह शरीर को मन के नियंत्रण से उठाकर
आत्मा के नियंत्रण में दे देता है।
मन तनाव देता है।
आत्मा उपचार देती है।
आत्मा —
- चोट को जोड़ती है
- कोशिकाओं को पुनर्जीवित करती है
- रक्त को शुद्ध करती है
- प्राणतत्व को बढ़ाती है
- सूक्ष्म शरीर की सफाई करती है
- स्थूल शरीर को बल देती है
इसलिए कहा गया —
आत्मा से बड़ा डॉक्टर कोई नहीं।
आप जब ध्यान में उतरते हैं
तो केवल मांस-हड्डी वाले शरीर की नहीं,
प्राण शरीर की भी सफाई होती है।
और याद रखें —
जब प्राण शरीर स्वस्थ होता है
तो स्थूल शरीर को रोग लग ही नहीं सकता।
आपका ऊर्जा स्तर बढ़ने लगता है।
आप हल्के, तेज, सक्रिय, उत्साही, सकारात्मक और शांत होते जाते हैं।
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भाग 6 : भोजन + ध्यान = तंदुरुस्ती + ईश्वर प्राप्ति
साधना के मार्ग में दो ही साधन सर्वोत्तम हैं —
1. सही भोजन (सात्त्विक, शुद्ध, जीवंत, शाकाहारी, मौसमी)
जो शरीर को बनाता है।
सही भोजन शरीर को मंदिर बनाता है।
2. गहरी ध्यान साधना
जो शरीर, मन और प्राण की सफाई करती है।
उसी सफाई से शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं।
उसी से रोग मिटते हैं।
उसी से मन स्थिर होता है।
उसी से आत्मबल जागता है।
उसी से ईश्वर का दर्शन होता है।
ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर शरीर बाधा नहीं, साधन है।
और शरीर तभी साधन बनेगा
जब वह —
- हल्का
- शुद्ध
- विषमुक्त
- प्राणवान
- शांत
- स्थिर
होगा।
भोजन इसे बनाता है।
ध्यान इसे पूर्ण करता है।
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भाग 7 : क्यों भोजन और ध्यान दोनों का संतुलन जरूरी है?
भोजन शरीर को जीवित रखता है।
ध्यान शरीर को जागृत रखता है।
यदि केवल भोजन हो —
तो शरीर भारी, सुस्त, रोगग्रस्त हो जाएगा।
यदि केवल ध्यान हो —
तो शरीर को सामग्री ही नहीं मिलेगी।
इसलिए संतुलन आवश्यक है —
- सात्त्विक भोजन शरीर को पोषित करे
- गहरी ध्यान साधना शरीर को शुद्ध करे
यही संतुलन हमें —
- स्वास्थ्य देता है
- शक्तिशाली बनाता है
- मानसिक स्थिरता देता है
- आध्यात्मिक विकास देता है
- ईश्वर की अनुभूति कराता है
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भाग 8 : भोजन और ध्यान का अंतिम सार
भोजन और ध्यान मिलकर ही
मनुष्य को पूर्ण बनाते हैं।
आज का मनुष्य केवल भोजन पर निर्भर है
इसलिए —
- वह कमज़ोर है
- थका हुआ है
- चिंता से भरा है
- बीमार है
- मन अशांत है
- आत्मबल समाप्त है
क्योंकि उसने दूसरे स्तंभ —
ध्यान, मौन, रिलैक्सेशन, आत्म-श्रवण
को भुला दिया है।
इसलिए यह समझना आवश्यक है—
**भोजन शरीर को चलाता है।
ध्यान शरीर को चंगा करता है।**
**भोजन धातुओं का निर्माण करता है।
ध्यान ऊर्जा का सृजन करता है।**
**भोजन शरीर की मरम्मत करता है।
ध्यान शरीर को नया बनाने की शक्ति देता है।**
**भोजन शरीर को संसार की ओर ले जाता है।
ध्यान शरीर को ईश्वर की ओर ले जाता है।**
यही कारण है कि
सभी महान योगियों, ऋषियों, सद्गुरुओं ने कहा —
“सही भोजन + सच्चा ध्यान
यही स्वास्थ्य, शक्ति और ईश्वर-दर्शन का मार्ग है।”
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अंतिम उपसंहार — एक सरल लेकिन जीवन-परिवर्तनकारी सत्य
आपका शरीर किसी भोजन से नहीं,
बल्कि आप में प्रवाहित प्राणशक्ति से चलता है।
प्राणशक्ति भोजन से नहीं,
बल्कि शांत मन, गहरी नींद और ध्यान से उत्पन्न होती है।
भोजन केवल कच्चा माल देता है।
शक्ति का निर्माण ध्यान और विश्राम करते हैं।
इसलिए —
भोजन सही करो, ध्यान प्रतिदिन करो,
शरीर को साफ रहने दो,
मन को शांत रहने दो,
और आत्मा को कार्य करने दो।
जब आप यह संतुलन सीख लेते हैं —
तो तंदुरुस्ती, निरोगी जीवन, प्रसन्नता और आध्यात्मिक उत्थान
आपके सहज साथी बन जाते हैं।
आपका शरीर तब केवल शरीर नहीं रह जाता —
वह ईश्वर प्राप्ति का पात्र बन जाता है।
✨ डॉ. भरत सोलंकी 9821755832 ✨
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(Tap–Seva–Sumiran–Samarpan आधारित जीवन साधना)
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